Nisha

Add To collaction

सैर दूसरे दरवेश

          

         ऐसी दौलत हाथ लगने से निहायत ख़ुशी हासिल हुई ,और उनपर अम्ल करना शुरू किया। दरवाज़ा बाग़ का खोल दिया  ,अपने उस अमीर को और साथ वालो को कहा की कश्तिया मंगवा कर ,यह सब जवाहर नक़द व जींस और किताबे बार  करलो। और एक निवाड़े पर सवार हो कर ,वहा से बहर को रवाना किया। आते आते जब अपने मुल्क के  नज़दीक को पंहुचा जहा पनाह को खबर हुई। सवार हो कर इस्तेकबाल किया ,और इश्तियाक़ से बे क़रार हो कर  कलेजे से लगा लिया। मैंने क़दम बोसी कर कर ,कहा की इस ख़ाक सार को क़दीम बाग़ में रहने का हुक्म हो। बोले की ए बरखु रदार !वह मकान मेरे नज़दीक मनहूस ठहरा ,लिहाज़ा उसकी मरम्मत और तैयारी खुद की। अब वह मकान  इंसान के रहने का नहीं रहा। और जिस महल में जी चाहे उतरो ,बेहतर यु है की क़िले में कोई जगह पसंद  करके ,मेरी आँखों के रु बा रु रहो। और पाए बाग़ जैसा चाहो ,तैयार करवा कर ,सैर तमाशा देखा करो। मैंने  बहुत ज़िद्द कर कर उस बाग़ को नए सिरे से तामीर करवाया ,और बहिश्त के जैसे आरास्ता कर ,दाखिल हुआ। फिर फरागत से  ,जिनो की तस्खीर की खातिर चिल्ले बैठा ,और तर्क हैवानात कर कर ,हाज़िरात करने लगा।

 

         जब चलीस दिन पुरे हुए ,तब आंधी रात को एक ऐसी आंधी आयी की बड़ी बड़ी इमारते गिर पड़ी। और दरख्त जड़ पेड़ से उखड़ कर कही से कही जा पड़े। और परिजादो का लश्कर नमूदार हुआ। एक तख़्त हवा से उतरा ,उस पर एक शख्स शानदार मोतियों का ताज और क़ीमती कपड़े पहने हुए बैठा था।  मैंने देखते ही बहुत अदब से सलाम किया। उसने मेरा सलाम लिया और कहा की अज़ीज़ ! यह क्या तूने न हक़ दुंद मचाया ?हमसे तुझे क्या मसला है ? मैंने इल्तेमास किया  की यह अजीज़ बहुत अरसे से तुम्हारी बेटी पर आशिक़ है ,और इसी लिए कहा से कहा खराब व खस्ता हुआ और जीते जी मरा। अब ज़िन्दगी से तंग आया हु ,और अपनी जान पर खेला हु ,जो यह काम किया है। अब आपकी ज़ात से उम्मीद वार हु की मुझ हैरान को अपनी तवज्जह से सरफ़राज़ करो ,और उसके दीदार से ज़िन्दगी और आराम  बख्शू ,तो बड़ा सवाब होगा।

 यह मेरी आरज़ू सुन कर बोला की आदमी खाकी ,और हम आतशी ,इन दोनों में बराबरी आनी मुश्किल है। मैंने क़सम खायी  की मैं उनके देखने का मुश्ताक़ हु। और कुछ मतलब नहीं ,फिर उस तख़्त नशीन ने जवाब दिया की इंसान  अपने क़ौल क़रार  रहता ,गरज़ की वक़्त सब कुछ कहता है ,लेकिन याद नहीं रखता। यह बात मैं तेरे भले के  लिए कह सुनाता हु ,की अगर तूने कभी हिम्मत और कुछ किया तो वो भी और तू भी दोनों खराब खस्ता  होंगे ,बल्कि खौफ जान  का है। मैंने फिर दुबारा सौगन्द याद की ,की जिस में तरफ़ैन (दोनों तरफ )की बुराई हो ,वैसा काम हरगिज़ न करूंगा  ,मगर एक नज़र देखता रहूँगा।  यह बात होती थी ,की अचानक वह परी जिसकी बात  चल रही थी  ,निहायत बनाओ किये हुए आ पहुंची ,और बादशाह का तख़्त वहा से चला गया। तब मैंने  इख़्तियार उस परी  को जान की तरह बगल में ले आया।

 इस ख़ुशी के आलम में बाहम उस बाग़ में रहने लगे। मारे डर के कुछ और ख्याल न करता ,बलाई मज़ाए लेता और सिर्फ देखा करता  ,वह परी मेरे क़ौल व क़रार के निबाहने पर दिल में हैरान रहती ,और कभी कहती की प्यारे !तुम भी अपने बात के  बड़े सच्चे हो ,लेकिन एक नसीहत में दोस्ती की राह से करती हु :अपनी किताब से खबरदार रहना  की जिन्न ,किसी न किसी दिन गाफिल पाकर ,चुरा ले जायँगे। मैंने कहा उसे मैं अपनी जान के बराबर  रखता हु।

 

          अचानक एक  रोज़ रात को शैतान ने वर्गालाया (बहकाया),शहवत (आरज़ू) की हालत में या दिल में आया ,की जो कुछ हो  सो हो ,कहा तलक अपने आपको थामु ?उसे छाती से लगा लिया और क़रीब किया जिमाअ किया। वही एक आवाज़ आयी  :यह किताब मुझको दे ,की इसमें इस्म आज़म है ,बे अदबी न कर। उस मस्ती के आलम में कुछ होश न रहा  ,किताब बगल से निकाल कर बगैर जाने पहचाने हवाले कर दी ,और अपने काम में लगा। वह नाज़नीन  यह मेरी नादानी  की हरकत देख कर बोली की ए ज़ालिम आखिर चूका और नसीहत भूला।

यह कह कर बे होश हो गयी ,और मैंने उसके सरहाने एक देव देखा की किताब लिए खड़ा है।  चाहा की पकड़ कर खूब मारु  और किताब छीन लू ,इतने में उसके हाथ से किताब दूसरा ले भागा। मैंने जो अफसु याद किये थे ,पढ़ने शुरू किये  .वह जिन्न जो खड़ा था ,बैल बन गया। लेकिन अफसू की परी ज़रा भी होश में न आयी ,और वही हालत  बे खुदी  की रही। तब मेरा दिल घबराया ,सारा ऐश तल्ख़ हो गया। उस रोज़ से आदमियों से नफरत हुई। उस बाग़ के गोशे में पड़ा रहता हु ,और दिल के बहलाने की खातिर ,यह मर्तबान जमररद का झाड़ दार बनाया करता हु। और हर महीने उस मैदान में उसी बैल पर  सवार हो कर जाया करता हु। मर्तबान को तोड़ कर ,गुलाम को मार डालता हु ,इस उम्मीद पर की सब मेरी यह हालत देखे ,और अफ़सोस खाये। शायद कोई ऐसा खुदा का बंदा मेहरबान हो की  मेरे हक़ में दुआ करे ,तो मैं भी  अपने मतलब को पहुँचू। ए रफ़ीक़ ! मेरे जूनून और सौदा की हकीकत है  ,जो मैंने तुझे सुनाई।

मैं सुन कर अब दीदा हुआ ,और बोला ए शहज़ादे ! तूने सच में बड़ी मेहनत उठायी ,लेकिन क़सम खुदा की खाता हु  की मैं अपने मतलब से दर गुज़रा ,अब तेरी खातिर जंगल पहाड़ में फिरूंगा ,और जो मुझसे हो सकेगा सो करूँगा।  यह वादा कर कर मैं उस जवान से रुखसत हुआ ,और पांच बरस तक सौदाई सा वीराने में खाक छानता फिर सुराख़ न मिला  .आखिर उक्ता कर  एक पहाड़ पर चढ़ गया और चाहा की अपने आपको गिरा दू की हड्डी पसली कुछ   साबित न रहे। वही सवार एक बुरका वाला  आ पंहुचा और बोला की अपनी जान मत रखो ,थोड़े दिनों के बाद  तू अपने मक़सद से कामयाब होगा। या साई अल्लाह ! तुम्हारे दीदार तो नसीब हुए ,अब खुदा के फ़ज़ल से उम्मीद वार हु  की ख़ुशी हो। और सब न मुराद अपनी मुराद को पहुंचे। 



   0
0 Comments